छत्तीसगढ़

कानाहर्राल पेन करसाद जातरा में शामिल हुए वन मंत्री श्री केदार कश्यप

बस्तर की समृद्ध जनजातीय संस्कृति और आस्था का दिखा भव्य संगम

रायपुर,

कानाहर्राल पेन करसाद जातरा में शामिल हुए वन मंत्री श्री केदार कश्यप

वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री केदार कश्यप आज नारायणपुर जिले के गारंजी में आयोजित पारंपरिक कानाहर्राल पेन करसाद जातरा में शामिल हुए। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि बस्तर की जनजातीय संस्कृति, परंपरा और लोक आस्था छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी पहचान है और इसे संरक्षित करना हम सभी की जिम्मेदारी है।

कानाहर्राल पेन करसाद जातरा में शामिल हुए वन मंत्री श्री केदार कश्यप

त्रिवार्षिक रूप से आयोजित होने वाला यह धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजन बस्तर की समृद्ध परंपराओं का जीवंत उदाहरण है। जातरा में बस्तर संभाग के विभिन्न क्षेत्रों के साथ-साथ महाराष्ट्र के गढ़चिरौली से भी 300 से अधिक देवी-देवताओं की उपस्थिति रही। हजारों श्रद्धालुओं और ग्रामीणों की सहभागिता से पूरा क्षेत्र भक्ति, आस्था और उत्साह से सराबोर नजर आया।

वन मंत्री श्री कश्यप ने पूजा-अर्चना कर प्रदेशवासियों की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन समाज को अपनी जड़ों और परंपराओं से जोड़ने का कार्य करते हैं। जनजातीय समाज की संस्कृति, रीति- रिवाज और परंपराएं प्रकृति से जुड़ी हुई हैं, जो पर्यावरण संरक्षण का भी महत्वपूर्ण संदेश देती हैं। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार जनजातीय संस्कृति, परंपरा और धार्मिक आयोजनों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए लगातार कार्य कर रही है। शासन की विभिन्न योजनाओं के माध्यम से आदिवासी क्षेत्रों में विकास कार्यों के साथ-साथ सांस्कृतिक धरोहरों को भी संरक्षित किया जा रहा है।

जातरा के दौरान पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन, लोक नृत्य और जनजातीय रीति-रिवाजों ने लोगों को विशेष रूप से आकर्षित किया।

दूर-दूर से पहुंचे श्रद्धालुओं ने देवी-देवताओं के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। आयोजन स्थल पर सामाजिक समरसता, भाईचारा और सांस्कृतिक एकता का अनूठा दृश्य देखने को मिला। वन मंत्री श्री कश्यप ने स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों से मुलाकात कर क्षेत्र के विकास एवं जनकल्याण से जुड़े विषयों पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार गांव, गरीब, किसान और आदिवासी समाज के उत्थान के लिए प्रतिबद्ध होकर कार्य कर रही है।

कानाहर्राल पेन करसाद जातरा ने एक बार फिर यह साबित किया कि बस्तर की सांस्कृतिक विरासत केवल परंपरा नहीं, बल्कि समाज की आत्मा है, जिसे सहेजकर रखना आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहद आवश्यक है।

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